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Saturday, November 26, 2022

अब कभी शहर वापस नहीं आऊंगा

मैंने शहर में जादू देखा
आकाशवाणी हुई
घबराइए नहीं!
जल्द से जल्द सहायता की जाएगी
पैदल न निकलें!
और हम बस कई हफ़्तों बाद
निकल गए
क्योंकि हम ही मूर्ख हैं
रोज़ पसीना बहाते
रोज़ मैल निकलता।
बाबूजी कहते थे
पैसा हाथ की मैल है
तो माँ कहती
दो जून रोटी भर कमाने के बाद
कहना ये सब।
यहाँ आया
काम किया
अचानक
सब बन्द हो गया
मैंने शहर में जादू देखा
ऊपर से आते नोट
मुझतक आते-आते
सिक्के बन गए!
हमने इमारतें बनाईं
तूफ़ान में छत चाहिए थी
तो किवाड़ बन्द हो गए!
हमने सड़कें बनाईं
उनपर दौड़ती गाड़ियाँ भी,
बैठना हुआ तो
हमारा बनाया ढाला बन्द हो गया!
हमने लाइनें बिछाईं
उनपर भागती रेल भी
जब बैठने की बारी आई
जेबे देखी गयीं
जादू दिखा!!
रेलें भाग गयीं!
जब तूफ़ान आया
जेबें देखी गईं
रेलें रुक गयीं
हवाई जहाज उड़ गए
हमने उनको उड़ते देखा!
ए बाउजी!
पैसा हाथ की मैल है?
आज घर जाने को भी
वही मैल चाहिए
ए बाउजी!
तुम्हारी ये बकवास मैं नहीं मानता
इसे फिर सुनने को भी
वही मैल चाहिए
बाउजी तुम झुट्ठे हो!
अम्मा तुम हार गई
दो जून रोटी नहीं मिली
अम्मा!
सिक्का जीत गया
तुम हार गई।
आधा रस्ता पार हो गया है
आती-जाती गाड़ियाँ
कहके जा रही हैं-
जान का मोल घर पर होगा
यहाँ पर सिक्के तुमसे भारी निकले!
मान का भार गाँव में होगा
यहाँ तो सिक्के तुमसे भारी निकले!
सोचा कि साइकिल पर बच्चे,
मैं और वो पैदल चल लेंगे
मगर साले
पहिये भी बड़े भारी निकलें
पहिये भी बड़े भारी निकलें
सिक्के हमसे भारी निकलें।
अब कभी शहर वापस नहीं आऊँगा
कभी नहीं
अगर मैं गांव पहुँच पाया
अगर।

लेखक- सृजन शुक्ला

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1 COMMENT

  1. ? गली से आवाज़ आई …..
    100 रुपए में पूरा परिवार ज़िन्दगी भर बैठकर खाइए.!
    ?बाहर निकल कर देखा तो.. चटाई बेचने वाला था…!
    ☝️ इसलिए..: धोषणाऍ और वादों से सावधान रहे, सोच समझ कर यक़ीन करें।
    जनहित में जारी..……

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