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Sunday, January 16, 2022

सामना: शिवसेना ने किसान आंदोलन के 6 महीना पूरे होने पर केंद्र पर घेरा

Mumbai: शिवसेना ने किसानों के आंदोलन को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार घेरा है। सामना के माध्यम शिव सेना ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लादे गए कृषि कानून के विरोध में देशभर के किसानों ने बुधवार को ‘काला दिन’ मनाया। और इस कानून के विरोध में हमारी जिद तथा शक्ति बिल्कुल भी कम नहीं हुई है, यह दिखा दिया। राजधानी दिल्ली स्थित सिंघु सीमा से शुरू हुए किसानों के इस आंदोलन को बुधवार को 6 महीने पूरे हो गए।

देशभर के किसानों द्वारा समर्थित, केंद्र सरकार की दमन नीति पर भारी पड़े और सरकार द्वारा पूरी तरह नजरअंदाज किए जाने के बावजूद भी अपने ध्येय से तथा शांति के मार्ग से सवा इंच भी नहीं हटा, किसानों के ऐसे आंदोलन के रूप में देश के इतिहास में दर्ज होगा। इस आंदोलन को रौंदने के लिए क्या नहीं किया गया? हमेशा के सरकारी हथकंडे आजमाए गए ही, परंतु शांतिपूर्वक आंदोलन करनेवाले किसानों को हर तरफ से मुश्किल में डालने का प्रयास भी किया गया।

दिल्ली की कड़ाके की ठंड, कोरोना का प्रकोप होने के बावजूद किसानों ने पूरी दृढ़ता व साहस के साथ कृषि आंदोलन के विरोध में यलगार का एलान किया। केंद्र सरकार की नाक में दम कर दिया। बातचीत के सिर्फ दौर पर दौर चलाना। कोई सम्मानजनक मार्ग निकलेगा नहीं, इस तरह से चर्चा करना, किसानों की मुख्य मांगों पर पानी फेरना, ऐसी नीति केंद्र सरकार द्वारा जान-बूझकर अमल में लाए जाने के बाद भी आंदोलनरत किसान न अपने लक्ष्य से भटके, न ही उनके आंदोलन की आग कम हुई।

उनकी रसद रोकने से लेकर उनके मार्ग में सड़कों पर लोहे की कीलें ठोंकने तक, उन्हें पीने का पानी न मिले, यहां से लेकर उन्हें दंगाई, खूनी ठहराने तक तमाम रास्ते केंद्र सरकार के साथ-साथ हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकार ने आजमाए। गणतंत्र दिवस के दिन किसान आंदोलन को ‘देशद्रोही’ ठहराने के लिए जो कुछ भी कराया गया, वो भयंकर ही था। उस दिन लाल किले पर की गई झुंडशाही, आंदोलन को बदनाम करने के लिए और उस पर देशद्रोह की मुहर लगाने के लिए ही थी।

इस झुंडशाही का नेतृत्व करनेवाले किससे संबंधित थे, यह ‘सत्य’ भी बाद में सामने आ गया। हर तरह के उत्पीड़न को बेअसर करते हुए और उस पर मात करते हुए कृषि कानून के विरोध में किसानों का आंदोलन दिल्ली की सीमा पर एक ध्येय, एक नीति के तहत ६ महीने से चल रहा है।

समय व्यतीत करके आंदोलन और आंदोलनकारियों को बेअसर बनाने के पुराने सरकारी हथकंडे को दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसानों के आंदोलन ने बेकार साबित कर दिया है। २६ मई को ‘काला दिवस’ मनाकर आंदोलनरत किसानों ने कृषि कानून पूरी तरह रद्द किए बिना हमारा आंदोलन रुकेगा नहीं और यह ‘चिंगारी’ बुझेगी नहीं, ऐसी ही चेतावनी केंद्र सरकार को दे दी है।

1907 की 26 मई को पंजाब में ही किसानों का ऐसा ही एक उग्र और बड़ा आंदोलन तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के विरोध में खड़ा हुआ था। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ इस नाम से यह आंदोलन जाना जाता है। आज स्वदेशी सरकार द्वारा लादे गए कृषि कानूनों के खिलाफ देश के किसानों को 6 महीने से आंदोलन करना पड़ रहा है। २६ मई, २०२१ को ‘काला दिन’ के रूप में मनाना पड़ रहा है।

अर्थात 114 वर्षों बाद भी हमने कोई सबक नहीं सीखा है। यही इसका अर्थ है। इस राष्ट्रीय आंदोलन को शिवसेना सहित देश के प्रमुख १२ दलों ने समर्थन दिया था। सरकार को अब तो उदासीनता और मौन छोड़ देना चाहिए। दिल्ली की सीमा पर किसानों के आंदोलन का ‘यलगार’ 6 महीने से शुरू है। सरकार ने किसानों पर कृषि कानून लादा। ऐसे न लादें। इस आंदोलन का विस्फोट एक सरकार ने झेला है। यह आंदोलन दोबारा न भड़के, यह जिम्मेदारी सरकार की ही है।

टीम बेबाक

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