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Monday, June 27, 2022

#Breakingnews बाबरी केसः आडवाणी और जोशी पर चलेगा आपराधिक मुकदमा

दिल्ली

विवादित बाबरी मस्जिद ढांचा विध्वंस मामले में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती को तगड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 13 लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायाधीश पीसी घोष और न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन की संयुक्त पीठ ने मामले में सीबीआई की अपील पर यह फैसला सुनाया है। हालांकि कोर्ट ने मामले में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह राहत दी है।

सीबीआई ने कोर्ट से बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और मध्य प्रदेश की पूर्व सीएम उमा भारती सहित 13 नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलने की मांग की है। सीबीआई की ओर से पेश वकील नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि रायबरेली की कोर्ट में चल रहे मामले को भी लखनऊ की स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर कर ज्वाइंट ट्रायल होना चाहिए।

भाजपा नेताओं पर से आरोप हटाने का किया गया आग्रह
लाल कृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और भाजपा एवं विहिप के नेताओं पर से आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने से संबंधित अपीलों में इलाहाबाद हाइकोर्ट के 20 मई, 2010 के आदेश को खारिज करने का आग्रह किया गया है। हाइकोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले की पुष्टि करते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) हटा दी थी। पिछले साल सितंबर में सीबीआई ने शीर्ष अदालत से कहा था कि उसकी नीति निर्धारण प्रक्रिया किसी से भी प्रभावित नहीं होती। वरिष्ठ भाजपा नेताओं पर से आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने की कार्रवाई उसके (एजेंसी के) कहने पर नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि बाबरी मस्जिद को गिराने के मामले में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह समेत 13 लोगों पर आपराधिक साजिश के तहत मुकदमा चले या नहीं? साथ ही यह भी तय होगा कि रायबरेली और लखनऊ में चल रहे दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ लखनऊ की अदालत में की जाये या नहीं?

हम इस मामले में इंसाफ करना चाहते हैं-SC
गौरतलब हो कि 6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने कहा था, ‘हम इस मामले में इंसाफ करना चाहते हैं। एक ऐसा मामला, जो 17 साल से सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी की वजह से रुका है। इसके लिए हम संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करके आडवाणी, जोशी समेत सभी 13 नेताओं पर आपराधिक साजिश की धारा के तहत फिर से ट्रायल का आदेश दे सकते हैं। साथ ही मामले को रायबरेली से लखनऊ ट्रांसफर कर सकते हैं। 25 साल से लंबित इस मामले को हम डे-टू-डे सुनवाई करके दो साल में खत्म कर सकते हैं।’

सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो, इसका असर कल्याण सिंह पर नहीं पड़ेगा। वह इस समय राजस्थान के राज्यपाल हैं और उन्हें संविधान की धारा 361 के तहत अभियोजन से सुरक्षा प्राप्त है। संविधान की इस धारा के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को कार्यकाल के दौरान किसी प्रकार की कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ता।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महज टेक्निकल ग्राउंड पर इनको राहत नहीं दी जा सकती। इनके खिलाफ साजिश का ट्रायल चलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा था कि बाबरी मसजिद विध्वंस के मामले में दो अलग-अलग अदालतों में चल रही सुनवाई क्यों न एक ही जगह हो? यहां बताना प्रासंगिक होगा कि तकनीकी आधार पर इनके खिलाफ साजिश का केस रद्द किया गया था, जिसके बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। लखनऊ में कार सेवकों के खिलाफ केस लंबित है जबकि रायबरेली में भाजपा नेताओं के खिलाफ केस चल रहा है।

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने दी थी राहत
बीते 6 अप्रैल को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा था कि इस तरह के मामले में इंसाफ के लिए हमें दखल देना होगा। यह देखते हुए तकनीकी कारणों से आडवाणी सहित इन नेताओं पर लगे आपराधिक षड्यंत्र केआरोप हटाए गए थे, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था हम इसके लिए संविधान के अनुच्छेद-142(सुप्रीम कोर्ट को मिले विशेषाधिकार) का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

क्या है बाबरी विध्वंस मामला?
वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने को लेकर दो मामले दर्ज किये गये थे। एक मामला (केस नंबर 197) कार सेवकों के खिलाफ था और दूसरा (केस नंबर 198) मंच पर मौजूद नेताओं के खिलाफ। केस नंबर 197 के लिए हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इजाजत लेकर ट्रायल के लिए लखनऊ में दो स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया, जबकि 198 का मामला रायबरेली में चलाया गया। केस नंबर 197 की जांच का काम सीबीआइ को सौंपा गया और 198 की जांच यूपी सीआइडी ने की थी। केस नंबर 198 के तहत रायबरेली में चल रहे मामले में नेताओं पर धारा 12 बी नहीं लगायी गयी थी। बाद में आपराधिक साजिश की धारा जोड़ने की कोर्ट में अर्जी लगायी, तो कोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी।

क्या हुआ था?

वर्ष 1992
6 दिसंबर को कार सेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। बाबरी मस्जिद गिराने को लेकर दो एफआइआर 197 और 198 दर्ज की गयी।

वर्ष 2001
हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में ज्वाइंट चार्जशीट भी सही है और एक ही जैसे मामले हैं। लेकिन रायबरेली के केस को लखनऊ ट्रांसफर नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य सरकार ने नियमों के मुताबिक, 198 के लिए चीफ जस्टिस से मंजूरी नहीं ली गयी। केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने भी हाइकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। पुनर्विचार और क्यूरेटिव पिटीशन भी खारिज कर दी गयी। रायबरेली की अदालत ने बाद में सभी नेताओं से आपराधिक साजिश की धारा हटा दी। इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 20 मई, 2010 को अपना आदेश सुनाया. ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

वर्ष 2011
करीब 8 महीने की देरी से सीबीआइ ने सुप्रीम कोर्ट में हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। 2015 में पीड़ित हाजी महमूद हाजी ने भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की।

टीम बेबाक

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