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Wednesday, October 20, 2021

जानिए दुर्गा के चमत्कारी मंत्रों का गुप्त प्रयोग, आदिशक्ति की साधना और अराधना

New Delhi: नवरात्रि पर्व में नो देवियों के स्वरूप हमें उनकी साधना, आराधना और पूजन का फल प्रदान करते हैं जो व्यक्ति से लेकर देश की समृद्धि के लिए भी आवश्यक है।

नवरात्रि पर्व के दौरान आदिशक्ति या जगतजननी की आराधना किन मंत्रों से की जाए। इससे पहले हम यह समझ लें कि समाज में सभी प्रकार के व्यक्ति हैं जिनमें से कुछ थोडा समय दे सकते हैं। कुछ पहले वालों की तुलना में थोडा और ज्यादा। जबकि कुछ समर्पण की भावना से ओतप्रोत व्यक्ति और ज्यादा समय देकर मां की आराधना करना चाहते हैं। ऐसे तीनों प्रकार के लोगों के लिए साधना के मंत्र देने का प्रयास इस तरह से है।

कम समय दे पाने वाले मां के भक्तों के लिए नौ बीज मंत्रों से परिपूर्ण और नवदुर्गा के प्रतीक नर्वाणमंत्र से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता।

(ओं3म् ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चै।)

यह मंत्र समस्तकामनाओं की पुर्ति करने वाला सिद्धिदायक मंत्र है। इसकी संख्या का निर्धारण कर आप नवरात्रि में लाभ उठा सकते हैं। दूसरा अष्टाक्षरी मंत्र है
(ओं3म् ह्रीं दुं दुर्गायै नम:।।)

इससे कुछ ज्यादा समय तक साधना करने वालों के लिए सिद्धकुंजिका स्तोत्र और अर्गला स्तोत्र हैं। इनमें से अर्गला का पाठ कर लाभ उठाने वालों की संख्या ज्यादा है। 25 मंत्र वाले इस अर्गला स्तोत्र के बारे में बाराही तंत्र शास्त्र के प्रणेता ने माना है कि इसके बीस श्लोक तंत्र शास्त्र में भी प्रयोग किए जाते हैं और सभी 25 श्लोकों का पाठ सामान्य गृहस्थ भक्त भी बिना किसी संशय के कर सकता है।

इस स्तोत्र का पाठ अलग-अलग संख्या में किया जाकर अलग अलग परिणाम या फल प्राप्त किया जा सकता है। जैसे एक बार का पाठ अगर कार्य में सिद्धि प्रदान करता है तो सौ पाठ करने वाले के भयंकर से भयंकर संकट भी मिट जाते हैं। इसी प्रकार 11 पाठ करने वाले भक्त को राजसभा यानी कि वर्तमान में सरकारी कार्यालयों में सम्मान मिलने लगता है।

अब उन भक्तों की बात जो उपरोक्त से कुछ ज्यादा समय तो देना चाहते हैं लेकिन मार्कण्डेय पुराण में उल्लेखित दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ एक समय या एक बैठक में पूरा नहीं कर पाने में स्वयं को असमर्थ महसूस करते हैं।

ऐसे भक्तों के लिए विभिन्न् विद्वानों के मतानुसार- सप्तशती के पाठ का शास्त्र सम्मत और पूर्णफलदायी तरीका इस प्रकार है कि नवरात्रि पर्व के नौ दिनों में सप्शती का पाठ निम्नानुसार किया जाए।

प्रथम दिवस कवचादि से प्रारंभ कर प्रथम अध्याय तक पाठ करें !
द्वितीय दिवस द्वितीय और तृतीय अध्याय का पाठ करें !
तृतीय दिवस केवल चतुर्थ अध्याय का पाठ करें !
चतुर्थ दिवस पंचम से अष्टम अध्याय तक का पाठ करें !
पंचम दिवस नवम और दशम अध्याय का पाठ करें!
षष्ठम दिवस केवल एकादश अध्याय का पाठ करें !
सप्तम दिवस द्वादश व त्रयोदश तथा मूर्तिरहस्यादि अंत तक करें !
अष्टम दिवस षोडस उपचार से आदशिक्ति का पूजन करें !
नवम दिवस हवन और बलिदान करें!

इसी प्रकार से दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की एक अन्य विधि भी प्रचलित है।

प्रथम दिवस कवचादि से प्रारंभ कर प्रथम अध्याय तक पाठ करें
द्वितीय दिवस द्वितीय और तृतीय अध्याय का पाठ करें
तृतीय दिवस केवल चतुर्थ अध्याय का पाठ करें
चतुर्थ दिवस पंचम से सप्तम अध्याय तक का पाठ करें
पंचम दिवस अष्टम और नवम अध्याय का पाठ करें
षष्ठम दिवस केवल दशम अध्याय का पाठ करें
सप्तम दिवस एकादश और द्वादश अध्याय का पाठ करें
अष्टम दिवस त्रयोदश अध्याय सहित मूर्तिरहस्यादि से अंत तक का पाठ करें
नवम दिवस पूजन, हवन और बलिदान आदि करें

इन दोनों क्रमों में से जानकारों ने दूसरे प्रकार के पाठ करने को तरीके को बेहतर बताया है।

प्रतिदिन दुर्गासप्तशती का पाठ करने वालों के लिए विद्वानों द्वारा तीन क्रम बताए गए हैं और तीनों क्रमों में सप्तशती का पाठ करने के लाभ भी अलग अलग बताए गए हैं।

इनमें पहला क्रम हे सृष्टि क्रम। इस क्रम से सप्तशती का पाठ करने वालों को हर प्रकार की शांति, सुख और सफलता प्राप्त होती है। सृष्टि क्रम में पाट पहले अध्याय से प्रारंभ कर त्रयोदश अध्याय तक पुर्ण किया जाता है। यह क्रम सभी में श्रेष्ठ बताया गया है।पाठ करने का दूसरा क्रम है स्थिति क्रम। इस क्रम से सप्तशती का पाइ करने वालों को अपनी स्थिति को निरंतर बनाए रखने में सहायक बताया गया है। इस क्रम के अनुसार सप्तशती के पाठ का श्रीगणेश पांचवें अध्याय से किया जाता है और समापन चौथे अध्याय पर होता है।

सप्तशती के पाठ करने का तीसरा और अंतिम क्रम संहार क्रम के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इस क्रम के नाम से लगता है कि किसी का नाश या हानि करना ही इस पाठ करने का उद्देश्य है। अत: इस क्रम का वर्णन हम यहां नहीं करेंगे। यह साधना गृहस्थ भक्त के लिए उपयोगी नहीं बताई गई है।

टीम बेबाक

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