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Sunday, December 5, 2021

तकनीकी सुविधाओं के युग में जाने क्यों बच्चों का वक्त से पहले बड़ा होना समाज के लिए खतरे की घंटी है

New Delhi: हम सब लोगों को बचपन में हमेशा बड़ा बनने की जल्दी होती थी क्योंकि हमें बड़े लोग आकर्षित करते थे उनके काम, कपड़े आजादी इत्यादि पर हम सब समय के हिसाब से ही बड़े हुए। लेकिन आज का दौर और आजकल के बच्चों की स्थिति बिल्कुल अलग है हमसे। क्योंकि यह युग तकनीकी सुविधाओं से भरा हुआ है। इसलिए पहले की तुलना में आजकल के बच्चों की परवरिश और जीवनशैली में बहुत परिवर्तन हुआ है और इसका मुख्य कारण है मोबाइल और इंटरनेट।

बच्चा पैदा होते ही खिलौनों से ज्यादा मोबाइल देखने का आदी हो जाता है।रोते हुए बच्चे को चुप कराना हो या उसे बहलाकर खाना खिलाना हो माता-पिता मोबाइल पर वीडियो दिखाने का सहारा लेते हैं। बिना इसके परिणाम जाने और ये दुष्प्रभाव सिर्फ़ आंखों की रोशनी तक सीमित नहीं रह गया है। बच्चा मोबाइल को उतना ही जरूरी समझते हुए बड़ा होता है जितना जरूरी खाना पढ़ना या खेलना है। ऊपर से ऑनलाइन पढ़ाई ने भी मोबाइल को बच्चों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बना दिया है

बच्चों को कम उम्र में नहीं मिलनी चाहिए ये जानकारी

  • हिंसक वीडियो
  • डबल मीनिंग जोक्स
  • गालियां
  • पोर्न
  • नफ़रत फैलाने वाले संदेश
  • इत्यादि शामिल हैं

सब कुछ समझने की समझ बच्चों में नहीं

ऐसे में बच्चों ने सामाजिक बुराइयों का भी सामना कर लिया है जिनके लिए उनका बौद्धिक विकास हुआ ही नहीं है। बच्चे इंटरनेट से सब कुछ जान रहें हैं पर सब कुछ समझने की समझ उन्हें नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे बड़ों की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं, जो उन्होंने इंटरनेट पर देखा उसे असल ज़िंदगी में दोहराने की जिज्ञासा हावी हो जाती है। मोबाइल में बच्चों द्वारा खेले जा रहे गेम्स उनमें हिंसक व्यवहार पैदा कर रहे हैं। अगर बच्चे को गेम खेलने के लिए मोबाइल ना दिया जाए तो वह बहुत बैचैन हो जाता है या चिल्लाता है व रोता है।

सोशल मीडिया का बच्चों पर दुष्प्रभाव

सोशल मीडिया पर बच्चों की अलग ही प्रतिस्पर्धा है। आजकल छोटे-छोटे बच्चों के वीडियो से सोशल मीडिया भरा हुआ है। बच्चों की मासूमियत भरी कलाओं की जगह अश्लीलता और डबल मीनिंग बातों ने ले ली है। बॉलीवुड के आइटम सांग्स पर बड़ों की तरह अदाएं और भाव के साथ डांस करते बच्चों में मासूमियत जैसे लुप्त हो रही हैं। बच्चे अभी से इस बात के लिए चिंतित हैं कि वे कैमरे पर कैसे दिख रहे हैं। उनका मेकअप कैसा है उनके बाल कैसे हैं। कुछ मामलों में माता-पिता इन बातों से अंजान हैं तो कुछ मामलों में माता-पिता खुद कैमरा लेकर बच्चों के इस तरह के वीडियो बनाते हैं। उन्हें पोस्ट करते हैं हालांकि साधारण वीडियो बनाने में कोई बुराई नहीं है पर जब बच्चे के व्यवहार और हाव् भाव में परिवर्तन दिखे तो माता-पिता को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

जहां बच्चों में पहले पढ़ाई या परीक्षा की प्रतिस्पर्धा होती थी वहीं अब ये प्रतिस्पर्धा है कि किसके वीडियो को कितने लाइक्स मिले किसकी फ़ोटो वायरल हुई और तो और बच्चों के परीक्षा परिणाम भी अब सोशल मीडिया पर पोस्ट होने की जरूरत बन गए हैं। बच्चों को प्रोडक्ट बना कर पेश किया जाना और उसपर हमारा ताली बजाना दोनों ही गलत हैं नतीजा यह होता है कि कम उम्र में बच्चे अवसाद, हीनभावना व अहंकार का शिकार हो जाते हैं। मामला गंभीर हो तो बच्चे हिंसक भी हो जाते हैं।

मोबाइल गेम्स खेलने पर पैरेंट्स ने डांटा तो बच्चों ने आत्महत्या की कोशिश की

आप खुद कल्पना कीजिए उस समाज की जहां 5 साल से 15 साल की उम्र वाले बच्चे अपराधी बन रहे हैं और यह हवा में कही हुई बात नहीं है अखबार और खबरें इसकी गवाह हैं पिछले दिनों ऐसी ही ख़बरे चर्चा में रहीं। 1 जुलाई माह में नवी मुंबई में एक 15 साल की किशोरी ने अपनी ही मां की कराटे बेल्ट से गला घोंट कर हत्या सिर्फ इसलिए कर दी क्योंकि उसकी मां ने उसे ना पढ़ने पर डांट दिया था अब सोचिए 15 साल की बच्ची को हत्या तरीका सिखाया किसने। 2 हाल ही मैं बिहार में दो बच्चों ने आत्महत्या की कोशिश सिर्फ़ इसलिए की क्योंकि उनके पिता ने उन्हें मोबाइल गेम्स खेलने पर डांट दिया था दोनों मामलों में बच्चों की उम्र क्रमशः 12 और 14 साल थी उस वक्त। 3 नवंबर माह में छत्तीसगढ़ में एक नाबालिग ने अपने दोस्त की पत्थर से पीट पीट कर हत्या कर दी क्योंकि दोस्त ने पब जी खेलने के लिए मोबाइल देने से मना कर दिया था।

इन मामलों में भी अपराध की वजह बना मोबइल

4 मई माह में एक नाबालिग भाई ने भी अपनी ही बड़ी बहिन की हत्या गेम खेलने के लिए मोबाइल ना देने पर कर दी थी। ऐसे अनगिनत मामले हैं अपराधों के जहां अपराधी नाबालिग है और अपराध की वजह मोबाइल है। ऐसे में अब हमें चाहिए कि बच्चों पर नियंत्रण रखें उन्हें अपना सही गलत नहीं पता होता पर माता पिता को तो पता है सिर्फ मोबाइल बच्चे के हाथ में थमा देना माता पिता की ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि बच्चा क्या पढ़ रहा है क्या देख रहा है क्या सीख रहा है इसपर नज़र रखना भी जरूरी है।

उससे भी ज्यादा जरूरी है बच्चे को सीमित उपयोग के लिए सीमित समय के लिए मोबाइल देना या जरूरी ना हो तो मोबाइल ना ही देना बेहतर है बच्चे अपने बड़ों से सीखते हैं इसलिए माता पिता या बड़े भाई बहनों को चाहिए कि वो बच्चे के सामने मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल ना करें। अगर माता पिता अपने बच्चे में जरा सा भी हिंसक व्यवहार देखें तो उसकी कॉउंसलिंग कराएं और उन्हें आउटडोर गेम्स या किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।

निधि खरे,

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