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Wednesday, October 20, 2021

कहानी भोपाल की ‘वीर माता निर्मला शर्मा’ की जो टूटने के बाद भी हमें जीना सिखाती हैं

भोपालः आज हम आपको एक ऐसी मां की कहानी बताने जा रहे हैं, जो टूटने के बाद भी हमें जीना सिखाती हैं। सब कुछ खोने के बाद भी बहुत कुछ करने की प्रेरणा देती हैं। जिनका नाम है, निर्मला शर्मा। जो मूलतः भोपाल की हैं। आप पेशे से शिक्षिका और सिरेमिक की एक प्रीतिष्ठत कलाकार भी हैं। आपकी कला का सम्मान करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने आपको शिखर सम्मान से भी नवाज चुकी है। आपके एक लौते बेटे कैप्टन देवाशीष शर्मा भारतीय सेना में थे। 10 दिसंबर 1994 को कैप्टन देवाशीष मिशन रक्षक के दौरान शहीद हो गए थे। मनों इस दिन बेटे की शहादत का समाचार मिलते ही निर्मला शर्मा का सब कुछ खो गया हो। एक उजेली दुनिया में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया हो। बेटे की जुदाई का दुख कैप्टन देवाशीष के पिता भी नहीं झेल पाए। कुछ सालों बाद वे भी खत्म हो गए।
लेकिन इन तमाम दुखों के बाद भी ‘वीर माता निर्मला शर्मा’ ने अपने-आप को टूटने नहीं दीं। बल्कि हर सबेरे के साथ जिंदगी के सफर में आगे बढ़ी। सेना के परिजनों की मदद के लिए हमेशा के लिए जुट गईं।

2007 से हर वर्ष लगा रही हैं एग्जिबीशन

सिरेमिक की मिट्टी से निर्मला शर्मा कई तरह के आर्ट पीस तैयार करती हैं। फिर उन्हें सेल करने के लिए भोपाल के जिला सैनिक कार्यालय सिरेमिक की तीन दिनों तक एग्जिबीशन लगाती हैं। इस एग्जिबीशन से प्राप्त होने वाली राशि को वे सशस्त्र सेना झंडा दिवस के दिन झंडा निधि में जमा कर देतीं हैं। यह क्रम पिछले 14 वर्षों से निर्मला शर्मा चला रही हैं। अब तक ‘वीर माता निर्मला शर्मा’ सेना झंडा निधि में 10 लाख रुपए की राशि जमा कर चुकीं हैं। ताकि सेना से जुड़े परिवार वालों की आर्थिक मदद हो सके। पहली बार 10 हजार रुपए की राशि जमा की गई थी।

मिट्टी के बर्तनों में लिखी जीती हैं, कविताएं

साल भर अपने हाथों से निर्मला शर्मा सिरेमिक मिट्टी से घरेलू उपयोग के बर्तन बनाती हैं। देशभर के कवियों की प्रेषित कविताओं का स्वतः इस पर लेखन करती हैं। इन कविताओं की लाइनों में एक मां का दर्द भी छिपा रहता है और जीवन जीने का संघर्ष भी। इन लाइने में अंधेरे में उजेले का दीप जलाकर औरों को प्रकाशमान करने का संदेश समाहित है। बेबाक न्यूज से बात करते हुए ‘वीर माता निर्मला शर्मा’ कहती हैं कि मुझे ये कार्य करके शांति मिलती है। सबकुछ खोने के बाद अब ये कला ही मेरे जीवन का आधार है। इसी में मैं अपने आप को व्यस्त रखती हूं।

तरुण चतुर्वेदी, नई दिल्ली

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