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Wednesday, October 20, 2021

एहसास…

दिन निकल रहे हैं, वक़्त गुज़र रहा है
एक वो एहसास
समझ के भी समझ के परे है वो
कुछ अजीब सा है ये
अब मोहब्बत या प्यार से न जोड़ लेना इसको
बस…एक एहसास ही तो है
मोहब्बत नहीं है ये जान लो, उससे कम भी नहीं है ये भी मान लो
बस…एक एहसास
वो धागा बना बैठा हूं, जो सुबह सुलझा लगता है
सूरज ढलते-ढलते उलझ जाता है
अंधेरा होते ही सोच मेरी उस मछली की तरह हो जाती है, जिसको समंदर से निकल के एक्वेरियम में डाल दिया गया हो
ज़िन्दगी जहां रुकी पड़ी है
वहीं एहसास और उलझन में भागमभाग चल रहा है
मुश्किल है, ढूंढना भी आसान नहीं है
रो सकता नहीं और हसीं आ नहीं रही
कहां जाऊं, किसे सुनाऊं, इस एहसास की शिकायत
बात करना या करने की कोशिश भी करना मुश्किल हो गया है, बात कम लड़ ज्यादा लेता हूं
क्या बताऊं अब, मैं तो मैं ही नहीं रहा
कुछ ऐसा भागा हूं की अपने पीछे रह गए हैं
खुद पीछे जा नहीं सका
आगे जाओ तो अपने और पीछे छूट जायेंगे
फंसा ऐसा हूं कि रोने के लिए बारिश का इंतज़ार करता हूं
मैं तो मैं ही नहीं रहा
एहसास…बस वो एक एहसास
समझ के भी समझ से परे है

लेखक- आशीष कुमार पांडेय

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