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आज से रथ यात्रा हुआ शुरू, पालकी पर निकले भगवान जगन्नाथ

आज से रथ यात्रा हुआ शुरू, पालकी पर निकले भगवान जगन्नाथ

ओडिशा: पुरी में आज यानी 14 जुलाई से भगवान जगन्नाथ की 141वीं रथ यात्रा शुरू हो गई है। आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यह यात्रा हर साल निकाली जाती है। इस यात्रा में देशभर के हजारों श्रद्धालु हिस्सा लेने पुरी पहुंचते हैं।

भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने घर यानी जगन्नाथ मंदिर से अपनी मौसी गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। भगवान जगन्नाथ के इस विशाल रथ को यात्रा में शामिल सारे लोग मिलकर खींचते हैं। कहा जाता है कि रथ खींचने वाले लोगों के सारे दुख दूर हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

रथ यात्रा कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज के बीच बड़े-बड़े रथों को सैकड़ों लोग मोटे-मोटे रस्सों की मदद से खींचते हैं। सबसे पहले बलभद्र जी का रथ प्रस्थान करता, इसके बाद बहन सुभद्रा जी का रथ चलना शुरू होता है और सबसे आखिर में जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकलती है।

यह रथ यात्रा गुंडिचा मंदिर जाकर संपन्न मानी जाती है। यह वही मंदिर’ है, जहां भगवान विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह कहा जाता है कि पुरी में भगवान जगन्नाथ शहर में घूमने के लिए निकलते हैं।

ये है रथ यात्रा की खासियत

बता दें हर साल भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा के लिए नए रथ का निर्माण किया जाता है। जगन्नाथ पुरी हिंदुओं के चार धामों में से एक माना जाता है। पुराणों में जगन्नाथ धाम की काफी महिमा है, इसे धरती का बैकुंठ भी कहा गया है। यह हिन्दू धर्म के पवित्र चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी में से एक है।

ये मंदिर भगवान विष्णु के अवतार को समर्पित है, जो 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं। पुरी की रथयात्रा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। संस्कृत में जगन्नाथ का अर्थ है जग यानी दुनिया और नाथ का अर्थ है भगवान। जिसमें भगवान जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा का रथ निकाला जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाला-पीला होता है और इसका आकार अन्य रथों से भी बड़ा होता है। मूल रूप से रथ के निर्माण के लिए नारियल की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि ये हल्की होती है।

भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष, बलराम का तालध्वज और सुभद्रा के रथ का नाम देवद लन होता है।

टीम बेबाक

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