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होली, दिवाली से लेकर इफ्तार पार्टी तक का आयोजन, सबका हो गया है राजनीतिकरण

होली, दिवाली से लेकर इफ्तार पार्टी तक का आयोजन, सबका हो गया है राजनीतिकरण

नई दिल्ली: होली, दिवाली से लेकर इफ्तार पार्टी तक का आयोजन, सबका राजनीतिकरण हो गया है। राजनीति हर हाल में होना है। भारत में राजनीति का स्तर क्या है? ये सवाल अपने आप में इसलिए बड़ा है क्योंकि इसका स्तर हर चुनाव में बदलता जाता है। साथ ही समय के साथ हर वक्त इसकी स्थिति में परिवर्तन आता है। भारत में धर्म और राजनीति की जगह कोई नहीं ले सकता है। पीढ़ि दर पीढ़ि खत्म हो जाती है लेकिन सियासत और धर्म की चमक और ही बढ़ती जाती है।

हम जिस दौर में हैं उस दौरा में धर्म के साथ राजनीति का तड़का चल रहा है। धर्म को राजनीति से जोड़ दिया गया है। त्योहारों का अब राजनीतिकरण हो गया है। हर त्योहार पर उसके धर्म के अनुसार उसके साथ राजनीति की जाती है। त्योहारों को अब वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल होने लगा है।

होली का आयोजन हो गया है सियासी

भारत में जब जब त्योहार का मौसम आता है तब तक लोगों की भावनाओं के साथ साथ राजनीति का रंग भी उसमें घोला जाता है। जिससे तथाकथित पार्टी या सियासी लोग का फायदा हो सके। अगर होली का त्योहार है तो हिंदू वोट बैंक साधने के लिए सियासी दल अपने स्तर से उसकी तैयारी करते हैं।

इफ्तार पार्टियों द्वारा साधे जा रहे हैं वोट बैंक

वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम वोटबैंक को साधाने के लिए सियासी लोग इफ्तार पार्टी जैसे आयोजन करते हैं। जिससे तुष्टीकरण का भाव को साधा जाए। ऐसे में कई बार सियासत को साधने के लिए त्योहारों में विशेष तौर पर आयोजन किए जाते हैं। फिलहाल इसका अभी बहुत ही चलन है।

ये लेखक के नीजि विचार हैं

प्रणव झा

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