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Wednesday, October 20, 2021

दिलीप कुमार स्पेशल: जानिए कैसे युसुफ खान बन गए दिलीप कुमार

दिलीप कुमार का नाम बदलना यह बतलाता है कि नेम चेंिजंग फेक्टर फिल्म इंडस्ट्री में आज से नहीं पहले भी था। इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो अपना नाम बदलने के बाद लोगों की नजरों में खूब दिखे। क्योंकि नाम का असर ब्रांड और ब्रांड का असर नाम पर पड़ता है। ऐसे में दोनों का संतुलन होना जरुरी है। कुछ ऐसा ही संतुलन बनाने के लिए देविका रानी ने दिलीप कुमार को नाम बदलने का सुझाव दिया था। जिस पर दिलीप न सिर्फ विचार किए बल्कि सुझाव पर अमल भी किया था।

खास बातें

  • देविका ने युसूफ को बना दिया दिलीप कुमार
  • पिता को उनके काम के बारे में पता न चले इसलिए अपना नाम ही बदल लिया
  • साहित्यकार भगवती ने दिया था दिलीप नाम, वहीं अभिनेता आशोक कुमार से लिया गया था कुमार

बेबाक टीम दिल्ली। देविका रानी का मानना था कि एक रोमांटिक हीरो के उपर युसुफ खां का नाम ज्यादा फबेगा नहीं। इसलिए युसुफ खान के लिए नए नाम की तलाश शुरू हुई , और युसुफ खान बन गए दिलीप कुमार। लेखक अशोक राज ने अपनी किताब में ‘हीरो’ में लिखा है कि हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार भगवती चरण वर्मा ने उन्हें दिलीप नाम दिया था जबकि माना जाता है कि कुमार उन्हें उस समय के उभरते सितारे अशोक कुमार से मिला था। फिल्म लेखक बनी रूबेन कहते हैं कि देविका रानी उनके लिए तीन नाम लेकर आई थीं, दिलीप कुमार, वासुदेव और जहांगीर। कहा ये भी जाता है की उस समय बॉम्बे टॉकीज़ में काम करने वाले और बाद में हिंदी के बड़े कवि बने नरेंद्र शर्मा ने उन्हें तीन नाम सुझाए, जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार युसुफ खां ने अपना नया नाम दिलीप कुमार चुना।

फिल्में बनाने वालों के प्रति दिलीप कुमार के पिता की राय अच्छी नहीं थी

नाम छुपाने की वजह यह भी थी कि इस नाम की वजह से उनके पुराने ख़्यालों वाले पिता को उनके असली पेशे का पता नहीं चल पाता। फ़िल्में बनाने वालों के बारे में उनके पिता की राय बहुत अच्छी नहीं थी और वो उन सबका नौटंकीवाला कहकर मजाक उड़ाते थे। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है , देविका रानी ने जब मुझे समेत कई एक्टर्स को बॉम्बे टॉकीज में नौकरी दी, तो साथ में इसके लिए भी ताकीद किया कि रिहर्सल करना कितना जरूरी है. उनके मुताबिक एक न्यूनतम लेवल का परफेक्शन हासिल करने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी है। बॉम्बे टाकीज़ में रिहर्सल को लेकर अपनी आदतों के बारे में दिलीप कुमार ने कहा था , ये सीख मेरे साथ शुरुआती वर्षों तक ही नहीं रही. बहुत बाद तक मैं मानसिक तैयारी के साथ ही सेट पर शॉट के लिए जाता था. मैं साधारण से सीन को भी कई टेक में और लगातार रिहर्सल के बाद करने के लिए कुख्यात था।

नाम बदलने का दिलीप के करिअर पर पड़ा गहरा असर

दिलीप कुमार कहते हैं नाम बदलने का उन पर गहरा असर हुआ , उन्होंने हॉलीवुड की फिल्मों के बड़े अदाकार की फिल्में देखनी शुरू कर दी। दिलीप कुमार ने कई भाषाएं सिखने शुरू कर दी , अशोक कुमार और एस मुखर्जी से वो बांग्ला सीखते , बदले में अशोक कुमार को उर्दू सिखाते। बॉम्बे टाकीज़ के मशहूर प्रोड्यूसर एस मुखर्जी ने उन्हें एक फंक्शन में उर्दू और फ़ारसी में भाषण देने को कहा , दिलीप कुमार ने ज़बरदस्त भाषण दिया था।

कई भाषाओं में थी मजबूत पकड़

दिलीप कुमार सिर्फ उर्दू फ़ारसी ही नहीं बल्कि तमिल ,तेलगु ,कोंकणी ,गुजरती ,बंगाली ,पंजाबी ,हिंदी , फ्रेंच ,जर्मन के अच्छे ज्ञाता था। वो ये सभी भाषाएं धाराप्रवाह बोल सकते थे। दिलीप कुमार कुराआन और गीता के अलावा बाइबल पर पकड़ रखते थे। , वो कई बार क़ुरआन ,गीता और बाइबल में लिखी बातों का अपनी बातचीत में जिक्र करते थे। दिलीप कुमार एक बेहतरीन वक्ता व स्क्रिप्ट राइटर भी थें,उन्हें किताबें पढ़ने का शौक था,उनके बाद इंग्लिश ,उर्दू और कई दूसरी भाषाओं की किताब का बड़ा कलेक्शन था। उन्हें मेडिकल साइंस की भी अच्छी खासी जानकारी थी। एक बार उन्होंने मेडिकल कांफ्रेंस को ऐड्रेस किया था। वहां बैठे लोग दिलीप कुमार की मेडिकल साइंस से जुडी जानकारी देख कर हैरान रह गए।

क्रिकेट खूब पसंद था और क्रिकेटर बनना भी चाहते थे

दिलीप कुमार लोगों की नकल उतारने में भी माहिर थे, वो बच्चों के रोने की बेहतरीन आवाज निकाल लेते थे। वो बचपन में भी लोगों की नकल उतारा करते था। दिलीप कुमार को स्कूल के दिनीन से खेल कूद का शौक रहा था, वो फूटबाल , बैडमिंटन ,क्रिकेट ,हॉकी ,गोल्फ और शतरंज के शौक़ीन रहे थे। फिल्मों में आने से पहले वो क्रिकेट के शौक़ीन रहे, दिलीप कुमार को क्रिकेट बेहद पसंद था, वो क्रिकेटर बनना चाहते थे , पुरे-पुरे दिन क्रिकेट खेला करते थे। दिलीप कुमार 8 फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजे जा चुके थे। इसके साथ ही वह 19 बार फिल्मफेयर नॉमिनेशन में आए। दिलीप कुमार को दादा फाल्के अवॉर्ड, पद्मभूषण अवॉर्ड और सर्वोच्च सम्मान भी मिला था। इसके अलावा, उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्चा नागरिक सम्मान भी मिला था।

तरुण चतुर्वेदी/टीम बेबाक

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