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बिहार के इस गांव के हर घर में हैं इंजीनियर

बिहार, गया

आज बिहार के बारे में भला-बुरा कहने वाले जरा गया के इस टोला में घूम आएं तो उन्हें पता चल जाएगा कि वो किसी ज्ञान की धरती पर हैं क्योंकि इस टोला के हर घर में रहता है एक इंजीनियर। जहां की पावन धरती पर बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी उसी जिले के पटवाटोली बस्ती के बच्चे हर साल बिहार का नाम रौशन करते आ रहे हैं। समय के साथ भले ही बिहार ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान खो दी है लेकिन प्राचीन समय में बिहार को विश्व गुरू के नाम से विख्यात था। देश-विदेश से लोग ज्ञान की प्राति के लिए आते थे। और आज गया का यह मोहल्ला बिहार को गौरवान्वित कर यह साबित कर रहा है कि आज भी बिहार ज्ञान की भूमि है। इस मोहल्ले से पिछले दो दशक में तकरीबन 350 इंजीनीयरों ने सफलता हासिल की है जबकि 200 छात्र या तो अलग-अलग आईआईटी संस्थान से निकले हैं या अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं। सबसे हैरानी की बात कि यहां कोचिंग की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन फिर भी इस मोहल्ले का हर दूसरा बच्चा आईआईटियन है।

आपको बता दें कि करीब 150 छात्रों ने कर्नाटक, पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों की इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पास कर अपनी शिक्षा पूरी की है। लगभग साढ़े तीन दशक पूर्व से शिक्षा जगत में विख्यात बिहार का मैनचेस्टर के नाम से मशहूर पटवाटोली मोहल्ले में रहने वाले होनहार आईआईटी मेन्स में अपना परचम लहराने में कामयाब होते हैं। साल 2016 में भी पूर्व की भांति 50 छात्रों ने आईआईटी मेन्स में सफलता हासिल किया था। साल 1992 से शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक यूं ही बदस्तूर जारी है। बीते पांच वर्षों से हर साल करीब 10 छात्र पटवा टोली से लगातार आईआईटी के लिए चुने जाते हैं।

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नक्सली प्रभावित इलाका फिर भी हौसले बुलंद
पटवा टोली नाम का ये गांव नक्सल प्रभावित इलाके में आता है। हालांकि, बिहार के अन्य गांवों की तरह की ये भी गांव सामान्य ही है लेकिन यहां के छात्र बाकी छात्रों से बिल्कुल अलग हैं। इसी वजह ने इस गांव को एक अलग पहचान दी है। गांव के ही पूर्व छात्रों द्वारा गठित एक संस्था की मदद से यहां स्टडी सेंटर चलाए जाते हैं। ऐसे छात्र जिन्होंने आईआईटी में सफलता हासिल कर ली है जब भी समय मिलता है तो वो गांव आकर इन बच्चों के साथ समय बिताते हैं और इन्हें पढ़ाई में सहायता करते हैं। ये छात्र यहां के बच्चों को सफल होने के लिए प्रोतसाहित करते हं और इनका मार्गदर्शन करते हैं। साथ ही ग्रुप डिस्कशन के लिए प्रेरित करते हैं। यहां तक कि जिन लोगों की जॉब हो गई है वो भी जब यहां आते हैं तो यही काम करते हैं। फिलहाल अभी पटवा टोली में पांच स्टडी सेंटर चल रहे हैं। यहां के बच्चों की सफलता के पीछे उनकी काबिलियत और मेहनत के साथ-साथ ऐसे सेंटर्स का भी अहम योगदान है। यहां पढने वाले छात्रों का कहना है, ‘‘यहां पढ़ाई करते हुए एक रुचि पैदा होती है। एक प्रतियोगी माहौल मिलता है। इससे पढ़ाई में निखार आता है।’’

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विदेशों में भी है इस गांव की पहचान
मानपुर पटवा टोली के इंजीनियर आज भारत ही नहीं विदेशों में भई अपनी सफलता का परच लहरा रहे हैं। इनकी सबसे ज्यादा संख्या अमेरिका में है। यहां करीब 22 लोग कार्यरत हैं। इसके अलावा सिंगापुर, कनाडा, स्विट्जरलैंड, जापान, दुबई आदि देशों की प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्यरत हैं।

कब बनी थी संस्था
इतने होनहार बच्चों को देश को समर्पित करने वाली इस संस्था का नाम नवप्रयास है। यह संस्था पटवा टोली के बच्चों का मार्गदर्शन करती है। इस संस्था की शुरुआत यहां के प्रथम आईआईटियन जितेंद्र कुमार ने 1992 में की थी। जितेंद्र अभी कैलिफोर्निया में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। फिलहाल वो वहीं के नागरिक हो गए है लेकिन अभी भी उनका रिश्ता यहां से उसी प्रकार जुड़ा हुआ है।

सीमित संसाधनों के बावजूद ये बच्चे सफलता की मिसाल कायम कर रहे हैं। यही वजह है कि बिहार अन्य राज्यों से भिन्न है। इन छात्रों ने एक बार फिर इस बात को सिद्ध कर दिया है कि यह बिहार की वही पावन भूमि है जहां दशरथ मांझी जैसे महान व्यक्तित्व ने अपने मेहनत, जूनून और हिम्मत के दम पर अकेले पहाड़ तोड़ दिया था। आज उसी भूमि पर एक बार फिर इतिहास दोहराया जा रहा है।

टीम बेबाक

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